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अलचिकि लिपि के उपयोग को बढ़ावा दें-मुर्मु

लिपि की शताब्दी पर स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया

'अलचिकि लिपि विश्वभर में संताल भाषा पहचान का सशक्त प्रतीक'

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Tuesday 17 February 2026 01:12:59 PM

alchiki script centenary celebration

नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अलचिकि लिपि शताब्दी महोत्सव का नई दिल्ली में उद्घाटन किया। राष्ट्रपति ने अलचिकि लिपि के 100 वर्ष होने पर स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया, साथही संताल समुदाय के 10 विशिष्ट व्यक्तियों को संताली लोगों केबीच अलचिकि लिपि के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने केलिए सम्मानित भी किया। राष्ट्रपति ने कहाकि संताल समुदाय की अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति है, हालांकि अपनी लिपि के अभाव में संताली भाषा को प्रारंभ में रोमन, देवनागरी, उड़िया और बंगाली लिपियों में लिखा जाता था।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बतायाकि नेपाल, भूटान और मॉरीशस में रहने वाले संताल समुदाय के लोग भी वहां प्रचलित लिपियों का उपयोग करते थे। राष्ट्रपति ने बतायाकि ये लिपियां संताली भाषा के मूल शब्दों का सही उच्चारण सही तरीके से नहीं कर पा रही थीं, साल 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु ने अलचिकि लिपि का आविष्कार किया था, तबसे यह संताली भाषा केलिए उपयोग में लाई जा रही है। राष्ट्रपति ने कहाकि आज यह लिपि विश्वभर में संताली भाषा की पहचान का सशक्त प्रतीक बन चुकी है और समुदाय में एकता का प्रभावी माध्यम भी है। द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि अलचिकि लिपि का शताब्दी समारोह इस लिपि के व्यापक प्रचार प्रसार का संकल्प लेने का अवसर होना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहाकि बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, उड़िया, बंगाली या किसी दूसरी भाषा में शिक्षा मिल सकती है, लेकिन उन्हें अपनी मातृभाषा संताली भी अलचिकि लिपि में सीखनी चाहिए। राष्ट्रपति ने खुशी जाहिर कीकि अनेक लेखक अपने साहित्यिक कार्यों से संताली साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने लेखकों को अपने लेखन से समाज में जागरुकता फैलाने की सलाह दी। राष्ट्रपति ने कहाकि भारत अनेक भाषाओं का उपवन है और भाषा व साहित्य समुदायों के भीतर एकता को बनाए रखने वाले सूत्र हैं। द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि साहित्य के आदान प्रदान से भाषाएं समृद्ध होती हैं, संताली साहित्य को अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों तक अनुवाद और लेखन के माध्यम से पहुंचाने व अन्य भाषाओं के साहित्य को संताली में उपलब्ध कराने के प्रयास बढ़चढ़कर किए जाने चाहिएं।

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