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'साधु संत ऋषि देश की एकता के शिल्पकार'

'युवा देश की संस्कृति एवं सभ्यतागत विरासत के प्रति जागरुक हों'

अगथियार ऋषि पर पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में बोले उपराष्ट्रपति

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Tuesday 16 June 2026 01:47:41 PM

vice president releases book on sage agathiyar

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भारत की सभ्यतागत एकता का जिक्र करते हुए कहा हैकि जहां राष्ट्रीय एकीकरण की चर्चाओं में अक्सर राजाओं और राजनीतिक संस्थाओं को याद किया जाता है, वहीं भारत की एकता के असली शिल्पकार इसके साधु संत और ऋषि रहे हैं। उन्होंने कहाकि इनमें से एक अगथियार ऋषि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सबसे बड़े प्रतीकों में से थे। उपराष्ट्रपति ‘अगथियार-द यूनिफायर’ पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में ये उद्गार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहाकि अगथियार ऋषि, जिन्हें उत्तर और दक्षिण भारतीय दोनों परंपराओं में समान रूपसे पूजा जाता है, हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक भारतीय एकता के प्रतीक हैं। उन्होंने कहाकि तमिलनाडु की पोथिगई पहाड़ियां और कावेरी नदी आजभी अगथियार ऋषि की याद दिलाती है। उन्होंने तमिल व्याकरण और तमिल संगम परंपरा के विकास में अगथियार ऋषि के अनुकरणीय योगदान पर प्रकाश डाला और उन्हें उत्तर व दक्षिण भारत की संस्कृतियों का सेतु बताया।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहाकि अगथियार ऋषि की विरासत दर्शाती हैकि भारत की भाषाएं एकदूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि बहनें हैं, जिन्होंने आपसी सम्मान और सदियों के सांस्कृतिक आदान प्रदान से एकदूसरे को समृद्ध किया है। सीपी राधाकृष्णन ने इस बातपर चिंता व्यक्त कीकि जहां कई लोगों ने तमिल भाषा से लाभ उठाया है, वहीं तमिल केलिए अपना जीवन समर्पित करने वालों को आज उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने 'तमिल थाथा' यूवे स्वामीनाथ अय्यर के योगदान और बलिदान का उल्लेख किया। उन्होंने दुख जताते हुए कहाकि तमिल भाषा केलिए स्वामीनाथ अय्यर की सेवा को जनता तक पर्याप्त रूपसे नहीं पहुंचाया गया है। उन्होंने सराहना करते हुए उन्हें वह विद्वान बताया, जिन्होंने तमिल की अनमोल साहित्यिक संपदा को नष्ट होने और गुमनामी से बचाया। उपराष्ट्रपति ने कहाकि भारत की एकता कोई समकालीन रचना नहीं है, बल्कि एक प्राचीन सभ्यतागत सच्चाई है, जिसे हज़ारों वर्ष से ऋषियों और प्रबुद्ध विचारकों ने सींचा है। उन्होंने कहाकि अगथियार ऋषि का जीवन और उनकी विरासत इसी शाश्वत सत्य की याद दिलाते हैं।
उपराष्ट्रपति ने आगाह कियाकि कुछ लोग भाषाई मतभेद पैदा करते हैं और अनावश्यक विवादों तथा विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कहाकि कोईभी शक्ति भारत में फूट पैदा नहीं कर सकती। उन्होंने ऐसी चर्चाओं का आह्वान किया, जो युवाओं में भारत की संस्कृति और सभ्यतागत विरासत केप्रति सकारात्मक समझ पैदा करें। उन्होंने उल्लेख कियाकि तमिलनाडु में सौ से अधिक मंदिर 'अगस्त्येश्वर' के रूपमें अगथियार को समर्पित हैं। उन्होंने कहाकि काशी और तमिलनाडु दोनों ही स्थानों पर एकही नाम वाले मंदिरों का होना भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। उपराष्ट्रपति ने इस विचार को खारिज कर दियाकि ब्रिटिश शासन के बिना भारत एकजुट नहीं रहता। उन्होंने कहाकि भारत की संस्कृति और सभ्यता ने हमेशा यहां के लोगों को विभिन्न क्षेत्रों और पीढ़ियों के पार एकसूत्र में पिरोए रखा है। पुस्तक के लेखकों की सराहना करते हुए उन्होंने कहाकि उन्होंने शोध से भारत के उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में अगथियार ऋषि से जुड़ी परंपराओं, कहानियों और संदर्भों की व्यापक उपस्थिति को बड़ी बारीकी से दर्ज किया है।
उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त कियाकि यह पुस्तक अगथियार ऋषि की महानता और भारतीय सांस्कृतिक एकता के संदेश को वैश्विक स्तर तक लेजाने में एक महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगी। उपराष्ट्रपति ने पुस्तक को प्रकाशित करने केलिए कलैमगल पत्रिका की प्रशंसा की। उन्होंने कहाकि कलैमगल 95 से अधिक वर्ष से भावी पीढ़ियों केलिए तमिल साहित्य, संस्कृति, विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करते हुए अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दे रही है। उन्होंने याद कियाकि कई तमिल विद्वानों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय नेताओं ने अपने लेखों से इस पत्रिका की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को समृद्ध किया है। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर, कलैमगल पत्रिका के संपादक कीलमबुर शंकर सुब्रमण्यम, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार मालन, पुस्तक के लेखक ओ श्यामा भट्ट और डॉ एमएन सुधा और पुस्तक का तमिल में अनुवाद करने वाली प्रोफेसर कल्याणी भी उपस्थित थीं।

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