नामवर सिंह बनारस में न हुए होते तो नामवर न होते-काशीनाथ
प्रोफेसर नामवर सिंह जन्मशती पर संगोष्ठी में वक्ताओं के उद्गारस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Friday 27 February 2026 01:21:11 PM
वाराणसी। नामवर सिंह बनारस में न होते तो नामवर फिर नामवर न होते, उन्हें बनारस ने नामवर बनाया, उन्हें दिल्ली ने नामवर नहीं बनाया। ‘नामवर सिंह-आलोचना और वैचारिकता’ विषय पर काशी हिंदी विश्वविद्यालय के प्रेमचंद सभागार में हुई त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी के वरिष्ठ कथाकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह ने उनपर ये उद्गार व्यक्त किए हैं। प्रोफेसर काशीनाथ सिंह ने कहा हैकि नामवर सिंह की कक्षाओं को जाने बिना उन्हें पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। क्लास में जगह न होने की वजह से विद्यार्थी उन्हें खिड़की और दरवाजों केपास खड़े होकर सुना करते थे, उनकी कक्षाओं में अन्य विषयों के विद्यार्थी भी आया करते थे। उनकी जिज्ञासा होती थीकि नामवर सिंह क्या पढ़ा रहे हैं, जो इतनी भीड़ है। काशीनाथ सिंह ने कहाकि प्रोफेसर नामवर सिंह की शिक्षा और अध्यापन की शुरुआत बीएचयू के हिंदी विभाग से हुई थी, ऐसेमें हिंदी विभाग का यह आयोजन उनको याद करने का महत्वपूर्ण उपक्रम है। नामवर सिंह से जुड़ी ‘आलोचना और वैचारिकता विषय’ पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी कामयाब रही।
कथाकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह ने कहाकि ‘फुलवा मरिगा रह गई बास’ मेरे लिए नामवर वह फूल हैं, जो अब नहीं हैं, लेकिन उनकी सुगंध अभीभी जीवन को जीवंत बना रही हैं। काशी हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर नामवर सिंह की जन्मशती पर संगोष्ठी का शुभारंभ महामना मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण केसाथ हुआ। विश्वविद्यालय की परंपरा के अनुसार कुलगीत हुआ। मंचस्थ अतिथियों को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ एवं पुस्तकें भेंटकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहाकि नामवरजी की पूरी आलोचना साहित्य की श्रेष्ठता को पहचानने का प्रयास है, उनके अनुसार श्रेष्ठ कवि वक्तव्य देने के बजाय क्षण की सृष्टि करता है। अरुण कमल ने कहाकि भाव सबलता और बहुलता किसी कविता को श्रेष्ठ बनाते हैं, ढेर सारे द्वंद्वों का समाहार रचना को श्रेष्ठता प्रदान करता है, जो शब्द मुद्रित हैं, वही अंतिम सत्य हैं।
तद्भव के संपादक और वरिष्ठ कथाकार अखिलेश ने कहाकि हिंदी की लगभग हर बहस में नामवर सिंह होते हैं, उन्होंने हमारी भाषा को अपनी मेधा और साहस के बल पर उत्तरोत्तर समृद्ध किया है, उन्होंने अपने नए-नए पाठ्यक्रमों के जरिये भाषा को जो सम्मान दिलाया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। अखिलेश ने कहाकि नामवरजी ने व्याख्यान को एक कला और संरचना की तरह रचा था, उन्होंने वक्तृता को एक विधा के रूपमें स्थापित किया, उनको सुनने केलिए हिंदी साहित्य के इतर के लोग भी उत्सुक रहा करते थे। अखिलेश ने कहाकि नामवरजी का व्यक्तित्व संश्लिष्ट टेक्स्ट की तरह बहुआयामी था, वे संस्कृति और साहित्य में बहुलता का सम्मान करते थे, उन्होंने अपभ्रंश, कहानी, उपन्यास, छायावाद आदि की नई व्याख्या करके उन्हें पुनर्स्थापित किया, वे पुराने रचनाकारों के बजाय नई रचनात्मकता की सोहबत में रहना पसंद करते थे, वे निश्चितवाद के हमेशा विरुद्ध रहे। बीएचयू के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप ने कहाकि नामवर सिंह ने भारतीय ज्ञान और आलोचना परंपरा में बहुत सार्थक हस्तक्षेप किया है, उन्होंने आलोचना की बहुत सारी परिभाषाएं बदलीं।
संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तावित करते हुए प्रोफेसर मनोज कुमार सिंह ने कहाकि वे सिर्फ़ साहित्य के आलोचक नहीं थे, बल्कि उनके लिए आलोचना जीवन की आलोचना थी। उन्होंने कहाकि जीवन जीने केलिए जोभी बाधा उत्पन्न हो रही थी, नामवरजी ने उन सभी की सविवेक आलोचना प्रस्तुत की, सरहपा से लेकर समकालीन हिंदी रचनाकारों तकपर उन्होंने लिखा। समाज विज्ञानी प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहाकि नामवर सिंह ने धोती कुर्ता, तनी हुई गर्दन और गंभीर विवेक से दिल्ली शहर में मशाल की तरह रौशनी की। उन्होंने कहाकि दिल्ली शहर की कोईभी गोष्ठी नामवरजी के बिना संभव नहीं होती थी, वे सभा-सेमिनारों में दंगल की तरह चुनौती दिया करते थे, उनकी रचनाओं में सर्वकालिक बुद्धिजीवी और समर्पित शिक्षक का तेज़ दिखाई पड़ता है। हिंदी की प्रवासी साहित्यकार डॉ दिव्या माथुर ने कहाकि नामवरजी जितना अच्छा लिखते थे, उतना अच्छा ही बोलते भी थे, नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' और 'वाद-विवाद-संवाद' किताब में प्रवासी साहित्य के लेखकों को काफ़ी सराहा है। नामवर सिंह पर पाश्चात्य विचारकों ल्योतार, मिशेल फूको और टेरी ईगल्टन आदि का प्रभाव है।
संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र का संचालन हिंदी विभाग के आचार्य प्रोफेसर नीरज खरे ने किया और धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के ही आचार्य प्रोफेसर प्रभाकर सिंह ने किया। संगोष्ठी में प्रोफेसर बलिराज पांडेय, प्रोफेसर अवधेश प्रधान, प्रोफेसर सदानंद शाही, प्रोफेसर राजकुमार, प्रोफेसर शशिकला त्रिपाठी, प्रोफेसर विनय कुमार सिंह, प्रोफेसर श्रद्धा सिंह, प्रोफेसर कृष्णमोहन पांडेय, प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रोफेसर प्रभाकर सिंह, प्रोफेसर कृष्णमोहन सिंह, प्रोफेसर बसंत त्रिपाठी, डॉ रामाज्ञा राय, पल्लव, डॉ किंगसन सिंह पटेल, अनीता गोपेश, डॉ सूर्यनारायण, डॉ मोतीलाल, शिव कुमार पराग, उज्ज्वल भट्टाचार्य, डॉ राहुल चतुर्वेदी, विवेक निराला, डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ विवेक सिंह, डॉ प्रभात कुमार मिश्र, डॉ मुशर्रफ़ अली, डॉ रविशंकर सोनकर, डॉ विंध्याचल यादव, डॉ सुशील सुमन, डॉ मानसी रस्तोगी, डॉ राजकुमार मीणा, डॉ प्रीति त्रिपाठी, विहाग वैभव, डॉ आशा यादव, बनारस एवं देश के विद्वान, अंकित कुमार मौर्य शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।