लोक कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं-राष्ट्रपति
कई लोक कलाओं के विलुप्त होने के संकट पर चिंता व्यक्त कीस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Thursday 13 August 2026 04:53:17 PM
नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज देश की समृद्ध कला संस्कृति को समेटे हुए प्रतिष्ठित कलाकारों को वर्ष 2024-25 केलिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किए। विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति ने कहाकि ये कलाकार भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसमें देश की मिट्टी की कथाएं और गीत जुड़े हैं, ऐसा मानचित्र जिसमें विविधता से भरी धरती के नृत्य और उत्सव समाए हैं और सदियों से विकसित भाषाओं और बोलियों की यादें समाई हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि भारत की संस्कृति जड़ों से जुड़ी हुई है, अलग-अलग खान-पान, वेषभूषा, नृत्य और संगीत, प्रकृति से प्रेरित हैं। उन्होंने उल्लेख कियाकि चहकती हुई चिड़ियों, कल-कल बहते झरनों, पेड़-पत्तों, बादलों, नदियों से प्रेरणा लेकर कलाकार अपने नृत्य और संगीत को प्रदर्शित करते हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि संगीत की अनेक पद्धतियां हैं, नृत्य की अनेक शैलियां हैं और लोकनाट्य के असंख्य रूप हैं, फिरभी इन सबके भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक भाषा है, जिसे हम भारतीय कहते हैं, विविधता और एकता का यह संगम हमारी लोक कलाओं की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। राष्ट्रपति ने कहाकि भारत की विभिन्न कला शैलियों में गुरु-शिष्य परंपरा की अनुकरणीय भूमिका है। उन्होंने कहाकि हमारी कलाओं की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक जीवंत गुरु ही होते हैं। द्रौपदी मुर्मु ने चिंता जताते हुए कहाकि आज के तेजीसे बदलते दौर में बहुत सी लोक कलाओं पर विलुप्त होने का संकट मंडरा रहा है, ऐसी कला विधाओं का न केवल साक्ष्य और प्रमाण रखना जरूरी है, बल्कि उन्हें जीवंत रखने केलिए विशेष प्रयास भी करने जरूरी हैं। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त कीकि संगीत नाटक अकादमी इसी उद्देश्य से 'कला दीक्षा' कार्यक्रम चला रही है। उन्होंने वरिष्ठ कलाकारों का आह्वान कियाकि वे अगली पीढ़ी को तैयार करने केलिए योजनापूर्वक प्रयास करें।
राष्ट्रपति ने कहाकि कला के संस्कार और समझ से जीवन को समृद्ध करने केलिए प्रकृति को सबसे सहज प्रशिक्षण संस्थान माना जाता है, लोक और जनजातीय कलाओं में जीवन का स्वाभाविक उल्लास और प्रकृति केसाथ गहरा संवाद दिखाई देता है। द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि इन कला रूपों में समुदाय की स्मृति और सामूहिक चेतना सहज रूपसे व्यक्त होती है, यही कारण हैकि लोक कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। राष्ट्रपति ने जिक्र कियाकि वे स्वयं ऐसे परिवेश से आती हैं, जहां बहुत से गीत ऐसे होते हैं, जो लिखे नहीं जाते, केवल गाये जाते हैं, बहुतसी ऐसी कथाएं होती हैं, जो पुस्तकों में नहीं मिलतीं, वे लोगों की स्मृति में रहती हैं, बहुत से नृत्य किसी मंच पर नहीं जन्म लेते, वे उत्सवों और आम जीवन केबीच जन्म लेते हैं। उन्होंने कहाकि भारतीय संस्कृति के अनेक गंभीर अध्येताओं ने कला की व्यापक परिधि की बात की है, संगीत और चित्रकला से लेकर बुनाई, पाक-कला और अश्व-कला तक अनेक दक्षताओं को कला के व्यापक संसार में स्थान मिला है, इस दृष्टि से कला जीवन से अलग कोई गतिविधि नहीं है।
द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले कलाकारों को बधाई दी और कहाकि उन्हें बताया गया हैकि आज के पुरस्कारों में उन कलाकारों को भी सम्मानित किया गया है, जो विदेशों में रहकर भारतीय कलाओं के प्रसार केलिए कार्यरत हैं। उन्होंने कहाकि भारतीय परंपरा के वाहक हमारे कलाकार देश की सामूहिक स्मृति के संरक्षक और भविष्य की कल्पना के सृजक हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि संगीत नाटक अकादमी को भारत की सॉफ्ट पावर का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त कियाकि अकादमी आने वाले समय में भी भारत की सांस्कृतिक ऊर्जा से समूचे विश्व को लाभांवित करती रहेगी। समारोह में केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और बड़ी संख्या में कलाप्रेमी उपस्थित थे।