मुंबई में एआई4एग्री 2026 ग्लोबल समिट में बोले राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह
एआई को खेती नीति, अनुसंधान और निवेश ढांचे का केंद्रीय स्तंभ बतायास्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Monday 23 February 2026 02:20:19 PM
मुंबई। केंद्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा हैकि भारत की अगली कृषि क्रांति कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित होगी यानी एआई भारत में अगली कृषि क्रांति अग्रदूत होगा। डॉ जितेंद्र सिंह मुंबई में ग्लोबल कॉंफ्रेंस ऑन एआई इन एग्रीकल्चर एंड इंवेस्टर समिट (AI4Agri 2026) को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने एआई को खेती नीति, अनुसंधान और निवेश ढांचे का केंद्रीय स्तंभ बताया। उन्होंने कहाकि एआई उन संरचनात्मक चुनौतियों केलिए पहलीबार बड़े पैमाने पर लागू होनेवाले समाधान प्रस्तुत करता है, जो लंबे समय से खेती उत्पादकता को सीमित कर रही हैं जैसे-अनियमित मौसम, जानकारी की असमानता और टुकड़े‑टुकड़े बाज़ार। उन्होंने कृषि को एक पुराने परंपरागत क्षेत्र के बजाय एक रणनीतिक क्षेत्र के रूपमें प्रस्तुत करते हुए एआई प्रयास को 10372 करोड़ रुपये के इंडिया एआई मिशन से जोड़ा, जो स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग क्षमता, डेटासेट और स्टार्टअप ढांचे का बड़े पैमाने पर निर्माण कर रहा है।
डॉ जितेंद्र सिंह ने भारतजन, भारत सरकार के स्वामित्व वाले बड़े भाषामॉडल पारिस्थितिकी तंत्र की चर्चा की, जिसने पहले ही ‘एग्री परम’ एक क्षेत्र विशिष्ट कृषि मॉडल जारी किया है, जो 22 भारतीय भाषाओं में काम करता है और किसानों को अपनी मातृभाषा में सलाह सहायता तक पहुंच देता है। उन्होंने कहाकि यह वह एआई है, जो किसान से मराठी, भोजपुरी या कन्नड़ में बात करता है और भाषाई समावेशन के महत्व पर ज़ोर दिया। राज्यमंत्री ने बतायाकि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग इंडिया एआई ओपन स्टैक को समर्थन दे रहा है, जो एक खुला, अंतरसंचालित ढांचा है, ताकि देश के किसीभी हिस्से में विकसित किए गए एग्री एआई समाधान राष्ट्रीय फ्रेमवर्क में आसानी से जुड़ सकें। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन आईआईटी, आईआईएससी और आईसीएआर केसाथ डीप टेक और एआई अनुसंधान को वित्तपोषित कर रहा है, जिसमें कृषि अनुप्रयोग भी शामिल हैं। डॉ जितेंद्र सिंह ने ड्रोन और उपग्रह आधारित मैपिंग की ओर इशारा किया, जो पहले से ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड और स्वामित्व मिशन को मजबूत कर रही हैं, क्योंकि वे भूमि और मिट्टी के सत्यापित डेटा प्रदान करती हैं।
उन्होंने जलवायु बुद्धिमत्ता में निवेश की बात की, जहां पृथ्वी विज्ञान और एआई को प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में एकीकृत किया जा रहा है, ताकि ‘किसान घबराएं नहीं, बल्कि योजना बनाएं।’ उन्होंने कहाकि जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका टिकाऊ और रोग प्रतिरोधी फसलों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण होगी, जिसमें कीट और पौधों के रोगों का शुरुआती, लक्षणरहित पता लगाना भी शामिल है, साथही एक चक्रीय फसल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में भी यह महत्वपूर्ण योगदान देगी। डॉ जितेंद्र सिंह ने कहाकि भारत के लगभग 14 करोड़ खेती इकाइयां, जिनमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, एकसाथ वार्षिक लगभग 70000 करोड़ रुपये का मूल्य उत्पन्न कर सकती हैं, अगर एआई संचालित सलाह प्रत्येक किसान को बेहतर निवेश समय, कीट भविष्यवाणी और बाज़ार संबंधन से प्रतिवर्ष केवल 5000 रुपये भी बचा दे। उन्होंने महाराष्ट्र की 500 करोड़ रुपये की महाएग्री एआई नीति 2025-29 को एक आदर्श मॉडल के रूपमें उद्धृत किया और कहाकि केंद्र ऐसी राज्यस्तरीय पहलों को समंवित और बढ़ावा देगा। उन्होंने बतायाकि बजट 2026-27 में ‘भारत-विस्तार’ एक बहुभाषी एआई उपकरण का प्रस्ताव रखा गया है, जो एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर के कृषि प्रथा पैकेज को एआई प्रणालियों केसाथ एकीकृत करके अनुकूलित सलाह सहायता प्रदान करेगा और खेती जोखिम को कम करेगा।
विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री का जोर छोटे उद्देश्य विशिष्ट एआई मॉडलों पर है, जो भारतीय मिट्टी के प्रकारों, जलवायु क्षेत्रों और फसल किस्मों पर प्रशिक्षित हों, मोबाइल फोनों और खेती उपकरणों से कम कनेक्टिविटी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी तैनात किए जा सकें। उन्होंने कहाकि कृषि‑डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को एक राष्ट्रीय कृषि डेटा कॉमन्स में विकसित होना चाहिए। उन्होंने हितधारकों से एक प्रस्तावित राष्ट्रीय एग्री एआई अनुसंधान नेटवर्क में योगदान करने का आह्वान किया, जो डीएसटी, राज्य सरकारों, आईसीआरआईएसएटी, आईसीएआर और वैश्विक संस्थानों केबीच सहयोग पर आधारित होगा और फसलों, मिट्टी व जलवायु केलिए भारत‑विशिष्ट आधारभूत डेटासेट विकसित करेगा। राज्यमंत्री ने कृषि एआई को दुनिया का सबसे बड़ा अनुपयोगित उत्पादकता बाज़ार बताया और निवेशकों से अलग‑थलग पायलट परियोजनाओं के बजाय पैमाने पर लागू होनेवाले मंचों केलिए धैर्यपूर्ण पूंजी लगाने का आग्रह किया। उन्होंने कहाकि इस सम्मेलन की सफलता प्रस्तुतियों से नहीं, बल्कि इससे मापी जाएगीकि यहां लिए गए संकल्पों के कारण अगले एकवर्ष में कितने पायलट मंच बन जाते हैं और कितने किसान बेहतर निर्णय लेने लगते हैं। उन्होंने कहाकि भारत वैश्विक कृषि एआई ढांचों में एक प्राप्तकर्ता के बजाय एक सह वास्तुकार के रूपमें कार्य करने का इरादा रखता है। उन्होंने कहाकि किसान को एआई बस इसलिए नहीं चाहिएकि वह हो, उसे उपयोगी होना चाहिए।