पहले चरण में 62.8 हेक्टेयर भूमि के लिए एक कार्ययोजना तैयार
वृक्षारोपण का पारिस्थितिक शैक्षिक और सांस्कृतिक महत्व बढ़ेगास्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Thursday 9 April 2026 11:38:09 AM
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने जैव विविधता को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय राजमार्ग विकास में पारिस्थितिक स्थिरता को एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे खाली पड़ी जमीनों पर औषधीय वृक्षारोपण के रूपमें 'आरोग्य वन' विकसित करने की पहल की है। इस पहल का उद्देश्य परागणकों, पक्षियों और सूक्ष्मजीवों को सहारा देनेवाली औषधीय वृक्ष प्रजातियों को लगाकर राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे जैव विविधता को समृद्ध करना है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती सुनिश्चित हो सके।
'आरोग्य वन' के विकास के पहले चरण में 62.8 हेक्टेयर में फैले 17 भूखंडों को शामिल करते हुए एक कार्ययोजना तैयार की गई है, जहां मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली एनसीआर, आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ राज्यों में विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के किनारे लगभग 67462 औषधीय वृक्ष लगाए जाएंगे। नीम, आंवला, इमली, जामुन, नींबू, गूलर, मौलसरी आदि औषधीय गुणों से युक्त लगभग 36 वृक्ष प्रजातियों की पहचान की गई है और इन्हें संबंधित कृषि जलवायु क्षेत्रों की उपयुक्तता के अनुसार भूमि भूखंडों पर लगाया जाएगा। जन जागरुकता और पहुंच को अधिकतम करने केलिए टोल प्लाजा, सड़क किनारे की सुविधाओं, इंटरचेंजों, क्लोवरलीफ जंक्शनों और राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे प्रमुख स्थानों केपास भूमि भूखंडों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस पहल का कार्यांवयन भारत सरकार के भूनिर्माण और वृक्षारोपण संबंधी दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाएगा।
राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण गतिविधियां हरियाली बढ़ाने और पारिस्थितिक स्थिरता के उद्देश्य से देशी और सड़क किनारे उगने वाले वृक्षों की मिश्रित प्रजातियों का उपयोग करके की जाती रही हैं। एनएचएआई ने आगामी मानसून में वृक्षारोपण केलिए लगभग 188 हेक्टेयर रिक्त भूमि की पहचान की है, ताकि वृक्षों के जीवित रहने की दर को बढ़ाया जा सके और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। औषधीय वृक्ष प्रजातियों पर केंद्रित एक विषयगत मॉडल को अपनाने से ऐसे वृक्षारोपण का पारिस्थितिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक महत्व बढ़ेगा। यह पहल आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को बढ़ावा देने और स्वदेशी औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण में योगदान देने की भारत सरकार की प्राथमिकता के अनुरूप भी है। इन वृक्षारोपण को ऐसे जीवंत भंडार के रूपमें परिकल्पित किया गया है, जो पारंपरिक औषधीय ज्ञान प्रणालियों और समकालीन समय में उनकी प्रासंगिकता के बारेमें जन जागरुकता पैदा करेंगे।
आरोग्य वन पहल पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ अवसंरचना विकसित करने केप्रति एनएचएआई की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है। पारिस्थितिक बहाली को जन जागरुकता केसाथ एकीकृत करके इस पहल का उद्देश्य हरित गलियारों का एक नेटवर्क बनाना है, जो न केवल सड़क किनारे की पारिस्थितिकी को बढ़ावा दे, बल्कि ज्ञान केंद्रों के रूपमें भी कार्य करे और भारत की औषधीय पौधों की समृद्ध विरासत और टिकाऊ जीवनशैली के बारेमें जागरुकता को प्रोत्साहित करे।