हिमालय के चारागाह बड़ी पशु एवं मानव आबादी के जीवनदाता
मंगोलिया के उलानबटार में यूएनसीसीडी सीओपी17 में संवादस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Wednesday 26 August 2026 02:41:54 PM
उलानबटार। भारत ने मंगोलिया के उलानबटार में यूएनसीसीडी सीओपी17 में चारागाहों के सामुदायिक नेतृत्व वाले पुनर्स्थापन का आह्वान किया है। भारत के पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा हैकि भारत का दृष्टिकोण भूदृश्य प्रबंधन और आजीविका संबंधी सहायता को एकीकृत करता है, जिसमें समुदाय की भागीदारी मुख्य होती है। भूपेंद्र यादव ने कहाकि सफल पुनर्स्थापन की शुरुआत पशुपालकों को महज लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षक मानने केसाथ होती है। उन्होंने पशुपालक समुदायों के भरण पोषण, जैव विविधता के संरक्षण और जल एवं कार्बन चक्रों को नियंत्रित करने में चारागाहों की अहम भूमिका पर जोर दिया और साथही विज्ञान, सुरक्षित अधिकार और सामुदायिक देखरेख पर आधारित पुनर्स्थापन के तरीकों को अपनाने को कहा।
मंगोलिया के उलानबटार में संयुक्तराष्ट्र मरुस्थलीकरण निवारण कन्वेंशन में ‘चारागाहों का पुनर्स्थापन और पशुपालक समुदायों का कल्याण’ विषय पर आयोजित मंत्रीस्तरीय संवाद में भूपेंद्र यादव ने वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के मेल से घास के मैदानों और चरागाहों को पुनर्स्थापित करने के भारत के अनुभवों को रेखांकित किया। पशुपालकों की केंद्रीय भूमिका पर जोर देते हुए भूपेंद्र यादव ने कहाकि पुनर्स्थापन की सफल प्रक्रिया की शुरुआत पशुपालकों को महज लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षक मानने के साथ होती है। उन्होंने कहाकि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को मिलाकर पुनर्स्थापन की एक ऐसी व्यवस्था तैयार की जा सकती है, जो इकोलॉजी की दृष्टि से उपयुक्त, आर्थिक रूपसे व्यावहारिक और सामाजिक रूपसे समावेशी हो।
भूपेंद्र यादव ने बतायाकि भारत के चारागाह हिमालय के चारागाहों व मध्य भारत के सवाना से लेकर सूखे थार, कच्छ के इलाकों और दक्षिण के शोला वनों तक में फैले हुए हैं और ये देश की बड़ी पशु एवं मानव आबादी का भरण पोषण करते हैं, जीवनदाता हैं। उन्होंने कहाकि उपग्रह आधारित मरुस्थलीकरण एवं भूमि के क्षरण संबंधी एटलस घास के मैदानों की मैपिंग और पुनर्स्थापन की योजना बनाने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं, जबकि चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मान्यता देने से टिकाऊ प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका मजबूत होती है। भारत में सामुदायिक संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियों का उल्लेख कर भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के ‘ओरान’ का उदाहरण दिया। उन्होंने कहाकि ये पवित्र उपवन हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय उनके सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय महत्व के कारण पूजते और उनकी रक्षा करते हैं।
भूपेंद्र यादव ने बतायाकि देशभर में लगभग 0.6 मिलियन हेक्टेयर में फैले ऐसे लगभग 25,000 सामुदायिक रूपसे संरक्षित पवित्र उपवन सामुदायिक देखरेख का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, ये पशुपालकों के जमीन के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं और ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ के वास समेत महत्वपूर्ण प्राकृतिक वासों का संरक्षण भी करते हैं। उन्होंने कहाकि इनमें से कई पवित्र उपवन कानूनी प्रावधानों केतहत संरक्षित हैं। केंद्रीय मंत्री ने खुले जंगल और घास के मैदान वाले इकोसिस्टम को पुनर्स्थापित करने के भारत के प्रयासों पर भी प्रकाश डाला। इन प्रयासों में चीता को फिरसे बसाना और गुजरात के बन्नी जैसे घास के मैदानों में उनके विस्तार की योजना शामिल है। उन्होंने बतायाकि गहरी जड़ों वाली घास मिट्टी में कार्बन जमा करने में मदद करती है, पानी के जमीन के अंदर जाने की क्षमता को बढ़ाती है और भारत के लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर में फैले स्थायी चारागाहों एवं पशुओं के चरने वाली भूमि में भूजल के पुनर्भरण में सहायक होती है।
भूपेंद्र यादव ने कहाकि भारत का दृष्टिकोण भूदृश्य प्रबंधन (लैंडस्केप मैनेजमेंट), जलसंभर विकास (वॉटरशेड डेवलपमेंट), सतत चराई (सस्टेनेबल ग्रेजिंग), चारे का विकास और आजीविका संबंधी सहायता की प्रक्रिया को एकीकृत करता है, जिसमें समुदाय की भागीदारी मुख्य होती है। उन्होंने कहाकि अब जबकि विकासशील देश भूमि की गुणवत्ता में क्षरण को रोकने एवं उसे सुधारने (लैंड डिग्रेडेशन न्यूट्रैलिटी) की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब वित्तपोषण, तकनीक और जानकारी तक बेहतर पहुंच की जरूरत है। उन्होंने कहाकि भारत चरागाहों के पुनर्स्थापन हेतु विशिष्ट एवं आसानी से मिलने वाली फंडिंग का स्वागत करता है और साउथ-साउथ सहयोग के जरिए अपने अनुभवों व समाधानों को साझा करने के लिए तैयार है।