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वैश्विक सहभागिता में 'राजनय' की बड़ी भूमिका

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का आईएफएस प्रशिक्षुओं को सलाह व प्रोत्साहन

दुनिया केसाथ संबंधों को सुदृढ़ करने के गौरव और दायित्व की बधाई

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Thursday 27 August 2026 05:30:52 PM

president droupadi murmu

नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा हैकि भारत की वैश्विक सहभागिता सदैव देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए यानी राष्‍ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। वे आज भारतीय विदेश सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों के 2025 बैच और भूटान के दो राजनयिक, जो वर्तमान में सुषमा स्वराज विदेश सेवा संस्थान में प्रवेश प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रहे हैं को राष्ट्रपति भवन में संबोधित कर रही थीं। राष्ट्रपति ने आईएफएस प्रशिक्षुओं को बधाई देते हुए कहाकि उन्हें विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने, राष्ट्र हित केलिए कार्य करने तथा विश्व के विभिन्न देशों केसाथ भारत के संबंधों को सुदृढ़ करने का गौरव और दायित्व प्राप्त होगा। राष्ट्रपति ने कहाकि भारत की आर्थिक प्रगति से विश्व केसाथ हमारे जुड़ाव केलिए नई संभावनाएं उत्पन्‍न हो रही हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राजनयिकों को सलाह दीकि वे निवेश, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार जैसे क्षेत्रोंमें उभरते अवसरों केप्रति सजग रहें तथा ऐसी भागीदारियां कायम करें, जिनसे भारत के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती हो। उन्होंने कहाकि भारत की समृद्धि में ‘राजनय’ की बड़ी भूमिका है और इसका प्रत्यक्ष योगदान मिलना चाहिए। उन्होंने कहाकि जैसे-जैसे भारत वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, राजनय की भूमिका बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति ने कहाकि यह भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के पेशेवर जीवन का एक चिरस्थायी सिद्धांत बना रहना चाहिए। उन्होंने कहाकि राजनयिकों को अपनी सहभागिता केवल सरकारी कार्यालयों तथा आधिकारिक बैठकों तक सीमित नहीं रखनी चाहिए, उन्हें विश्वविद्यालयों, कारोबारी जगत, शोधकर्ताओं, नवप्रवर्तकों, सांस्कृतिक संस्थानों, सिविल सोसायटी तथा स्थानीय समुदायों से भी जुड़ाव बढ़ाना चाहिए। उन्होंने उन्हें सलाह दीकि वे प्रवासी भारतीय समुदाय से सार्थक रूपसे जुड़ें, विशेष रूपसे प्रवासी भारतीय समुदाय के युवा सदस्यों को भारत से जुड़े रहने केलिए प्रोत्साहित करें तथा उनके लिए ऐसे अवसरों की तलाश करें, जिनसे वे भारत की विकास यात्रा में योगदान दे सकें।
राष्ट्रपति ने उल्‍लेख कियाकि कूटनीति के स्वरूप में भी तेजीसे बदलाव हो रहा है, प्रौद्योगिकी ने राष्ट्रों केबीच संवाद, कारोबार के संचालन और नागरिकों तक सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच के तौर-तरीकों को बदल दिया है। उन्होंने कहाकि विदेशों में भारत के मिशनों को भी इस बदलाव के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा, प्रौद्योगिकी का उपयोग केवल संचार के साधन के रूपमें ही नहीं, बल्कि सुशासन और अधिक गहन भागीदारी के माध्यम के रूपमें भी किया जाना चाहिए, लेकिन प्रौद्योगिकी कभीभी मानवीय संवेदनशीलता का स्थान नहीं ले सकती। उन्होंने राजनयिकों से यह सुनिश्‍चित करने केलिए आग्रह कियाकि जरूरत के समय भारतीय मिशनों के द्वार हमारे देशवासियों केलिए हमेशा सुलभ और उपलब्‍ध रहें। उन्होंने कहाकि प्रत्येक भारतीय को, जिन्‍हें सहायता की जरूरत है, यह अनुभव होना चाहिएकि उनका मिशन सहज सुलभ, संवेदनशील और विश्वसनीय है। राष्ट्रपति ने कहाकि भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी न केवल ऐसे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसकी सभ्यता का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, बल्कि वे एक युवा, गतिशील और आकांक्षी भारत का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि शांति, बहुलतावाद, संवाद, सह अस्तित्व और विविधता केप्रति सम्मान, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भारत के सभ्यतागत लोकाचार में गहराई से समाहित हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि निरंतर अनिश्चित और जटिल होते विश्व में राजनयिकों को सजग, जिज्ञासु और निरंतर सीखने केलिए तत्पर रहना चाहिए, सबसे बढ़कर, उन्‍हें सदैव विनयशील बने रहना चाहिए। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों से आग्रह कियाकि विदेश यात्रा के दौरान वे सदैव यह स्मरण रखेंकि वे केवल भारत सरकार का ही नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों तथा उनकी आशाओं और आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने उन्हें ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पेशेवर आचरण के उच्चतम मानदंडों को बनाए रखने की सलाह दी।

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